कमलमुख देखत तृप्त न होय
यह सुख कहा दुहागिन जाने,
रही निशा भर सोय
ज्यों चकोर चाहत उडुराजे,
चंद्र वदन रही जोय
नेक अकोर देत नहीं राधा
चाहत पिय ही निचोय
उनतो अपनो सर्वस्व दीनो,
एक प्राण वपु दोय
भजन भेद न्यारो परमानंद
जानत बिरला कोय
भावार्थ- परमानंदासजी इस पद के द्वारा पुष्टिजीव को भक्ति का भेद यानि कुछ मर्म की बात समझाना चाह रहे हैं , कि कृष्ण से जब संबंध जुड़ा है तो सदा सन्मुखता कृष्ण की बनी रहे , यही पुष्टिजीव का कर्तव्य होना चाहिये.
जो उनको पाकर भी अपना सौभाग्य भूषित नहीं कर सकी वे तो दुर्भगा ही है, दुहागिन स्त्री की तरह.
श्यामसुंदर के मनोहर कमलमुख को देखकर भी कोई तृप्त हो जाय वो सौभाग्यशाली हो ही नहीं सकता.
पुष्टि मे तुष्टि(संतोष) का क्या काम? यदि कृष्ण के कमल मुख के दर्शन मे तुष्टि प्राप्त हो रही है वह पुष्टिभक्ति हो नहीं सकता.
अपने ठाकुर { गाम के नहीं }के तो दर्शन करते हुए भी निरंतर दर्शन की चाहना बनी रहनी चाहिये. चकोर इस मर्म को बहुत अच्छी तरह से समझता है जो चंद्रमा के उदय होते ही उस पर अपनी दृष्टि एक टक गढ़ाये ही रखता है व एकपल के लिये भी ओझल नहीं होता.इसी तरह श्रीराधाजी निरंतर श्याम के ध्यान मे तो रहती ही है पर संन्मुख होने पर दृष्टि सदा प्रीतम की ओर ही लगाये रखतीं है । मानो उनकी रूपमाधुरी को निचोकर ही पी जायेंगी.
श्रीराधाजी ने अपना पूर्ण समर्पण प्राणेश श्रीकृष्ण को किया है देह दो दिखलाई देती हैं यही लीलाभेद है प्राण तो एक ही है पर लीला हेतू देह अलग दिखलाई पड़ती है.
"एकोहं बहुस्याम" के न्याय से कृष्ण ने अपने स्वरूपामृत के पान के लिये अपने ही श्रीअंग से राधाजी को प्रकट किया अतः दो देह हैं इसी को परमानंदासजी समझा रहे हैं कि केवल लीलार्थ ही दो वपु हैं. प्राण तो एक ही है. इस मर्मरूपी भेद को बिरले ही समझ सकते हैं या समझ पाये हैं. यही निर्गुण भाव है जो जिसका अंश है वह अंशी को ही तो भजेगा .
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