तुं है सखी बडभागी बडी.
नंदलाल तेरे घर आवत है :
निज कर गुंथ सुमन के गजरा .
अपने हाथ पहरावत है !!
तुं अपनों श्रृंगार करत तब.
दरपन तोहै दिखावत है :
अानंद कंद चद्र मुख तेरो .
निरख निरख सुख पावत है !!
जो सब ऊनके गुन बखानत .
वो तेरो गुन गावत है :
कुंभनदास लाल गिरिधरन प्रभु .
तेरें ही हाथ बिकावत है ...
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