श्रीमद्वल्लभ के घर प्रभु जो फिर अवतार न धरते हो।।
तो हम सरिखे मूढ पतित जन कहो केसें उद्धरते हो।।1।।
बिन पाये ब्रजपति पद पंकज काकी सेवा करते हो।।
श्रीगिरिधरन राधिकावर बिन रसना कहा उच्चरते हो।।2।।
सिब सुरेश दिनमनि गनेश के होय कनोड़े डरते हो।।
अति आतुर पुनि अर्कतूल से सबन के पायन परते हो।।3।।
जब हमहू लोगन की न्यांइ घर घर भटकत फिरते हो।।
कर्मयोग पुनि ज्ञान उपासन इनही में पच मरते हो।।4।।
कहा भयो निज बिरद जानकें पतित जान उद्धरते हो।।
रुचिर रूप बल दास नारायन तृखित नयन क्यों ठरते हो।।5।।
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