Thursday, January 11, 2018

सूरदास जी

बडो निठुर विधना यह देख्यौ।
जब तेँ आजु नंदनंदन छबि,
बार-बार करि पेख्यौ।।१।।
नख,अँगरि,पग,बाजु बंध,
कटि,रचि कीन्हौ निरमा।
ह्रदय बाहु,कर, अंस,अँग-अँग,
मुख सुंदर अति बान।।२।।
अधर,दसन,रसना,रस,वानी,
स्त्रवन नैन अरू भाल।
" सूर " रोम प्रति लोचन देत्यौ,
देखत बनत गुपाल।।३..

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