नैनन निरख हरि कौ रूप।। निकसि सकत नहीं लावनि - निधि तें मानों पर्यो कोऊ कूप।।1।। छीत - स्वामी गिरिधरन विराजित नख सिख रूप अनूप।। बिनु देखें मोहिं कल न परत छिनु सुभग वदन छबि - जूप।।2।।
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