Friday, January 12, 2018

राधा कृष्ण

कमलमुख देखत तृप्त न होय
यह सुख कहा दुहागिन जाने,
            रही निशा भर सोय
ज्यों चकोर चाहत उडुराजे,
               चंद्र वदन रही जोय
नेक अकोर देत नहीं राधा
           चाहत पिय ही निचोय
उनतो अपनो सर्वस्व दीनो,
                 एक प्राण वपु दोय
भजन भेद न्यारो परमानंद
              जानत बिरला कोय

भावार्थ- परमानंदासजी इस पद के द्वारा पुष्टिजीव को भक्ति का भेद यानि कुछ मर्म की बात समझाना चाह रहे हैं , कि कृष्ण से जब संबंध जुड़ा है तो सदा सन्मुखता कृष्ण की बनी रहे , यही पुष्टिजीव का कर्तव्य होना चाहिये. 
       जो उनको पाकर भी अपना सौभाग्य भूषित नहीं कर सकी वे तो दुर्भगा ही है, दुहागिन स्त्री की तरह.
            श्यामसुंदर के मनोहर कमलमुख को देखकर भी कोई तृप्त हो जाय वो सौभाग्यशाली हो ही नहीं सकता.
       पुष्टि मे तुष्टि(संतोष) का क्या काम? यदि कृष्ण के कमल मुख के दर्शन मे तुष्टि प्राप्त हो रही है वह पुष्टिभक्ति हो नहीं सकता.
अपने ठाकुर { गाम के नहीं }के तो दर्शन करते हुए भी निरंतर दर्शन की चाहना बनी रहनी चाहिये. चकोर इस मर्म को बहुत अच्छी तरह से समझता है जो चंद्रमा के उदय होते ही उस पर अपनी दृष्टि एक टक गढ़ाये ही रखता है व एकपल के लिये भी ओझल नहीं होता.इसी तरह श्रीराधाजी निरंतर श्याम के ध्यान मे तो रहती ही है पर संन्मुख होने पर दृष्टि सदा प्रीतम की ओर ही लगाये रखतीं है । मानो उनकी रूपमाधुरी को निचोकर ही पी जायेंगी. 
      श्रीराधाजी ने अपना पूर्ण समर्पण प्राणेश श्रीकृष्ण को किया है देह दो दिखलाई देती हैं यही लीलाभेद है प्राण तो एक ही है पर लीला हेतू देह अलग दिखलाई पड़ती है.
       "एकोहं बहुस्याम" के न्याय से कृष्ण ने अपने स्वरूपामृत के पान के लिये अपने ही श्रीअंग से राधाजी को प्रकट किया अतः दो देह हैं इसी को परमानंदासजी समझा रहे हैं कि केवल लीलार्थ ही दो वपु हैं. प्राण तो एक ही है. इस मर्मरूपी भेद को बिरले ही समझ सकते हैं या समझ पाये हैं. यही निर्गुण भाव है जो जिसका अंश है वह अंशी को ही तो भजेगा .

Thursday, January 11, 2018

कुम्भनदास जी

तुं है सखी बडभागी बडी.
नंदलाल तेरे घर आवत है :
निज कर गुंथ सुमन के गजरा .
अपने हाथ पहरावत है !!
तुं अपनों श्रृंगार करत तब.
दरपन तोहै दिखावत है :
अानंद कंद चद्र मुख तेरो .
निरख निरख सुख पावत है !!
जो सब ऊनके गुन बखानत .
वो तेरो गुन गावत है :
कुंभनदास लाल गिरिधरन प्रभु .
तेरें ही हाथ बिकावत है ...

मकर सक्रांति पुष्टिमार्ग में

💐 *भोगी उत्सव..१.*.💐
🙏�.. दिनांक.. १३/१४.. जान्युआरी.
          २०१८.. 🙏�

👌�भोगी भोग करत सब रसको,
🌺नंदनंदन जसोदा को जीवन,
🌺गोपीन मान पति सर्वस को ।।१।।
☘तिलभर संग तजत नहीं निजजन,
🌻गान करत मनमोहन जसकों।।
🍀तिलतिल भोग धरत मन भावन,
🏵"परमानंद" सुख ले यह रसको।।२।।
      *विषेश भावार्थ*
❤ प्रभु क्या क्या रसका भोग करत है ?
*१.. नंदरायजी के साथ.. पुत्र भावक*
*२.. जसोदाजी के साथ.. वात्सल्यभाव..*
*३.. गोपीजनों साथ माधुर्यभाव ,मान-भाव और सब के रक्षक-पति भाव.*
*४..सखाओं के साथ.. सख्यभाव का भोग करते है*
*५.. नंदरायजी की साथ राजस भाव,*
      *श्रीयशोदामाताजी की साथ सात्विक भाव और गोपीजनों साथ तामस भाव और सर्व के पति रक्षक होने का निर्गण भाव का भोग करते ह*ै.. *" भोगी भोग करत सब रसको"*
*प्रभु भोक्ता है,और जड-जीव सृष्टि भोग्य है..       ।।१।।
💐यह भोगी अपना भोग्य का संग क्षणभर ( तिलभर) भी छोडता नहीं,यह उत्तम भोगी का लक्षण है।
🌴( हर जड-जीव में सच्चिदानंदत्व सर्वकाल होता है ही। जीव में अंतर्यामी-परमात्मा स्वरुप से भी होता है,ईसलिये आपश्री जीव या जड को तिलभर भी त्यजते नहीं)
            🎄ईस प्रकार,प्रभु जिनको अपना जानते है,उनको संयोगरुप से हर वक्त संगी बनाते है,और विप्रयोग में,अंतःकरण में बिराजकर संगी बनाता है- ईसलिये यह भोगी क्षणभर  भी निज्जनको छोडते नहीं ( तिलभर संग तजत नहि निज्जन )
      ❤ यह भक्तों भी भोगी का यशगान करत है,ईसलिये भोगी को जो जो पसंद है ,वह सब चीजें ( तील-तील...असंख्य) भोग धरते रहते है और प्रभु मी,भक्तों का यह भोग का स्नेहसे अंगिकार करते है अथवा
☘" *प्रभु भोगी जो रस* *का उपयोग करता है,यह परम-आनंद रुप है*
    *जैसे.. पद्मनाभदासजी ने छोले के अलग अलग ढग करके* *उसमें सब सामग्री का भाव किया और प्रभु  प्रसन्नता पूर्वक आरोगेल और* *श्रीगिरधरजीको कहा "आपके छप्पनभोग भोग में छोला जैसा स्वाद नहीं है.*... *ऐसा यह है भोगी..*.

श्री वल्लभाचार्य जी

श्रीमद्वल्लभ के घर प्रभु जो फिर अवतार न धरते हो।।
तो हम सरिखे  मूढ पतित जन कहो केसें उद्धरते हो।।1।।
बिन पाये ब्रजपति पद पंकज काकी सेवा करते हो।।
श्रीगिरिधरन राधिकावर बिन रसना कहा उच्चरते हो।।2।।
सिब सुरेश दिनमनि गनेश के होय कनोड़े डरते हो।।
अति आतुर पुनि अर्कतूल से सबन के पायन परते हो।।3।।
जब हमहू लोगन की न्यांइ घर घर भटकत फिरते हो।।
कर्मयोग पुनि ज्ञान उपासन इनही में पच मरते हो।।4।।
कहा भयो निज बिरद जानकें पतित जान उद्धरते हो।।
रुचिर रूप बल दास नारायन तृखित नयन क्यों ठरते हो।।5।।

छीतस्वामी

नैनन निरख हरि कौ रूप।।
निकसि सकत नहीं लावनि - निधि तें मानों पर्यो कोऊ कूप।।1।।
छीत - स्वामी गिरिधरन विराजित नख सिख रूप अनूप।।
बिनु देखें मोहिं कल न परत छिनु सुभग वदन छबि - जूप।।2।।

सूरदासजी

श्याम सोंह कुच परस कियो।।  नंद सदनते अबही आवत, ओर बिपीनको नाम लियो।। ऐसी सपथ करो काहे को, जो कछु आज करी सो करी।। अब जो काल अनंत सिधारो, तब जानोगे तुमने हरी ।। में सत भाव मिल हसी तुमसो , जहा आजकी सोंह करी।। सूर श्याम भई सो भई , अबते सबको नेम धरो।।।

सूरदास जी

बडो निठुर विधना यह देख्यौ।
जब तेँ आजु नंदनंदन छबि,
बार-बार करि पेख्यौ।।१।।
नख,अँगरि,पग,बाजु बंध,
कटि,रचि कीन्हौ निरमा।
ह्रदय बाहु,कर, अंस,अँग-अँग,
मुख सुंदर अति बान।।२।।
अधर,दसन,रसना,रस,वानी,
स्त्रवन नैन अरू भाल।
" सूर " रोम प्रति लोचन देत्यौ,
देखत बनत गुपाल।।३..