भये प्रगट कृपाला दीन दयाला, यशुमति के हितकरी।
हर्षित महतारी रूप निहारी, मोहन मदन मुरारी॥ १ ॥
कंससुर जाना अति भय माना, पुताना बेगि पठाई।
सो मन मुसुकाई हर्षित धाई, गई जहाँ जदुराई॥ २ ॥
तेहि जाई उठाई हदय लगाई, पयोधर मुख मे दीन्हे।
तब कृष्ण कन्हाई मन मुसुकाई, प्राण तासु हरी लीन्हे॥ ३ ॥
जब इन्द्र रिसाये मेघ बुलाये, वंसीकरण ब्रज सारी।
गोवन हितकारी मुनि मन हारी, नख पर गिरिवर धरी॥ ४ ॥
कंसासुर मारे अति हंकारे, वत्सासुर संहारे।
बकासुर आयो बहुत डारयो,ताकर बदन बिडारे॥ ५ ॥
अति दीन जनि प्रभु चक्रपाणी, ताहि दीन निज लोक।
ब्रह्मासुर राइ अति सुख पाई, मगन हुये गये शोका॥ ६ ॥
यह छंद अनूपा है रस रूपा, जो नर याको गावै ।
तेहि सम नहि कोई त्रिभुवन माँहीं, मन-वांछित फल पावे॥ ७ ॥
दोहा :-
नन्द यशोदा तप कियो, मोहन सो मन लाय।
तासो हरि तिन्ह सुख दियो, बाल-भाव दिखलाय
Saturday, August 24, 2019
जन्माष्टमी की शुभकामनाएं
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