Wednesday, August 21, 2019

सूरदासजी

अंखियां हरि–दरसन की प्यासी
देख्यौ चाहति कमलनैन कौ¸ निसि–दिन रहति उदासी
आए ऊधौ फिरि गए आंगन¸ डारि गए गर फांसी
केसरि तिलक मोतिन की माला¸ वृन्दावन के बासी
काहू के मन को कोउ न जानत¸ लोगन के मन हांसी
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ¸ करवत लैहौं कासी

#सूरदास

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