बिलावल
धन तेरस रानी धन धोवति।
गर्ग बुलाई वेद विधि पूजति ठौर ठौर घृत दीप संजोवती।।1।।
धूप दीप नैवेद्य भोग धरि, श्यामसुंदर इक टक मुख जोवति।
"परमानन्द" त्यौहार मनावती, सब ब्रज पुष्टि मारग धन बोवति।।2।।
अनुवाद- अर्थ -
धन तेरस को जसोदा रानी जी धन (गहने) को धो रही हैं। श्रीगर्ग मुनि को बुलाकर वेद की विधि से पूजा कर रही हैं। जगह जगह पर, दीप जला कर रखे हैं। धूप दीप, नैवेद्य और भोग रख कर श्रीश्यामसुन्दर का मुख दर्शन कर रही हैं। श्री परमानन्द दास जी कहते है कि सब ब्रज में पुष्टिमार्ग, रूपी धन बो कर त्यौहार मना रही हैं।
(यह पद परमानन्द दास जी द्वारा लिखा गया। पद और इसका अर्थ विद्यारत्न व्यास, नाथद्वारा वाले की पुस्तक 'ब्रज लीला हरि पुष्टि सौरभ' से लिया गया है। इस पुस्तक जी में पुष्टिमार्ग के अष्ट छाप सखाओं के लिखे हुए पद दिए गए हैं और हर पद के सामने उसका आसान हिंदी अनुवाद छापा गया है ताकि भक्तों और वैष्णवों को समझने में आसानी हो।)
ब्रज लीला हरि पुष्टि सौरभ पुस्तकजी में यह पद 1334 नम्बर पर उपलब्ध हैं।
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