चरन कमल बंदौ हरि राई ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई ॥१॥
श्री प्रभु के चरण कमलों को ध्यान करो
प्रभु की कृपा से पंगु (लँगड़ा, पैर रहित) व्यक्ति भी पर्वत लांघ सकता हैं।
अंधे दृष्टी हीन को भी सब दिखने लगता हैं।
बहरा जिसे सुनाई न देता हो वह भी सुन सकने में समर्थ हो जाता हैं।
गूंगा जो बोल न पाता हो वह भी बोलने लगता हैं।
प्रभु के कृपा हो तो निर्धन व्यक्ति राजा बन जाता हैं।
सूरदास जी के प्रभु बहुत कृपालु है।
इन्हें प्रेम श्रद्धा और भक्ति से स्मरण करके प्राप्त किया जा सकता हैं।
(यह पद सूरदास जी द्वारा लिखा गया। पद और इसका अर्थ विद्यारत्न व्यास, नाथद्वारा वाले की पुस्तक 'ब्रज लीला हरि पुष्टि सौरभ' से लिया गया है। इस पुस्तक जी में पुष्टिमार्ग के अष्ट छाप सखाओं के लिखे हुए पद दिए गए हैं और हर पद के सामने उसका आसान हिंदी अनुवाद छापा गया है ताकि भक्तों और वैष्णवों को समझने में आसानी हो।)